गौरेया का संघर्ष: घर के आंगन में पंछियों के लिए दो घोंसले बनाएं, जिसमें आखिर आ गई गौरेया, फिर पहुंची चील- अनिल रावत

देहरादून। अनिल रावत, वरिष्ठ पत्रकार। मैंने अपने घर के आंगन में पंछियों के लिए दो घोंसले बनाएं, इस उम्मीद के साथ की एक न एक दिन इसमें पंछी आएंगे और अपना आशियाना बनाएंगे। मैं रोज सुबह उठकर इन घोंसलो को इस उम्मीद से देखता की शायद आज कोई न कोई पंछी इनमें अपना आसरा बनाएगा।

लेकिन कई दिनों के इंतजार के बावजूद इनमें कोई नहीं आया। मैं कुछ मायूस हो चूका था, कि तभी मैंने एक दिन देखा की उसमें एक मादा गोरैया बैठी थी और शायद अपने होने वाले बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान महसूस कर रही थी। कुछ देर बाद नर भी वहां आ पहुंचा। शायद दोनों ने आपस में सलाह कर इसे अपने यहां आने वाले नए मेहमानों के लिए उपयुक्त स्थान माना और फिर यहीं रहने का फैसला किया।

कुछ दिनों बाद उस घोंसले में नन्हें बच्चों की चहचहाट सुनाई, जिसे सुनकर गौरेया के जोड़ो को तो ख़ुशी हुई होगी, लेकिन मेरी ख़ुशी का भी ठिकाना नहीं था, कि मैंने किसी के लिए बिना किसी स्वार्थ के आशियाना बनाया और आज वह पूरी तरह आबाद हो गया है। गौरेया और उनके नन्हें बच्चें ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन यापन कर रहे थे। नर और मादा रोज सुबह उड़ान भरते और बच्चों के लिए दाना ले कर आते। धीरे धीरे नन्हे चूजे कुछ बड़े हो गए और माता पिता के बाहर जाने पर घोंसले से इस उम्मीद में बाहर झांकते की वे जल्द ही दाना लेकर लौटेंगे।

एक ऐसी विडंबना हुई कि जब सुबह गौरेया का जोड़ा घोंसले से उड़ान भरने की तैयारी कर ही रहा था कि एक चील जो की कई दिनों से उन पर नजर गड़ाए हुए, ने उन पर आक्रमण कर दिया। हालांकि नन्ही गौरेया के जोड़ो ने काफी संघर्ष किया, लेकिन चील के आगे उनकी बिसात ही क्या थी और वे हार गई। कुरुर चील ने उनका बसबसाया आशियाना तो उजाड़ा ही, गौरेया और उनके नन्हे बच्चों को भी अपना निवाला बना लिया।

यह सब देख कर मैं काफी दुखी हुआ और सोचने लगा कि मैंने निस्वार्थ इनके लिए आशियाना बनाया था और चील ने केवल अपनी एक वक़्त की भूख मिटाने के लिए बसे बसाए परिवार को उजाड़ दिया। बस यही सोच कर मन को शांत कर लिया कि यह चील का स्वभाव है।

लेकिन उसके बाद मैंने फिर एक घोंसला बनाया और आज फिर उसमें एक गौरेया का जोड़ा बसर करने आ गया है, लेकिन कब तक यह नियति को ही पता होगा। बस ख़ुशी इस बात कीहै कि मैंने बिना स्वार्थ के यह काम किया।

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