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IAS वन्दना की मार्मिक कहानी, रूढ़िवादी गांव हरियाणा से जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड

रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड की जिलाधिकारी बनी वन्दना हरियाणा के रूढ़िवादी गांव नसरुल्लागढ़ की रहने वाली हैं। जहां लड़कियों की पढ़ाई बिल्कुल मना थी। रुद्रप्रयाग की DM बनने से पहले वन्दना पिथौरागढ़ जिले की मुख्य विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत थीं। आइए देखते हैं आज की IAS वन्दना का संघर्ष और पिता महिपाल का साथ।

हरियाणा की वंदना हमेशा गुरुकुल के कठोर अनुशासन में रही, बाहर की दुनिया कभी देखी नहीं, सपना सिर्फ एक ही था- IAS अफसर बनना है, और 24 साल की उम्र में पहली ही कोशिश में यह सपना वंदना ने साकार कर दिखाया।

IAS परीक्षा में हिंदी मीडियम से टॉपर से भारत में 8वीं रेंक–

…………आठवीं रैंक
……….नाम- वंदना
…..रोल नंबर-029178
बार-बार नाम और रोल नंबर मिलाती और खुद को यह यकीन दिलाने की कोशिश करती कि यह मैं ही हूं. हां, वह वंदना ही थी। भारतीय सिविल सेवा परीक्षा 2012 में आठवां स्थान और हिंदी माध्यम से पहला स्थान पाने वाली 24 साल की एक लड़की।

तपस्वी साधु की तरह एक साल तक अपने कमरे में बंद होकर की पढ़ाई–

वन्दना की यह पहली कोशिश थी, कोई कोचिंग नहीं, कोई गाइडेंस नहीं, कोई पढ़ाने, समझने, बताने वाला नहीं। आइएएस की तैयारी कर रहा कोई दोस्त नहीं। यहां तक कि वंदना कभी एक किताब खरीदने भी अपने घर से बाहर नहीं गईं। किसी तपस्वी साधु की तरह एक साल तक अपने कमरे में बंद होकर सिर्फ और सिर्फ पढ़ती रहीं। अर्जुन की तरह वंदना को सिर्फ चिड़‍िया की आंख मालूम है। वे कहती हैं, ‘‘बस, यही थी मेरी मंजिल।’’

वंदना का जन्म 4 अप्रैल, 1989 को हरियाणा के नसरुल्लागढ़ गांव के एक बेहद पारंपरिक परिवार में हुआ। पूरे हरियाणा की ही तरह उनके घर में लड़कियों को पढ़ाने का चलन नहीं था। उनकी पहली पीढ़ी की कोई लड़की स्कूल नहीं गई थी। वंदना की शुरुआती पढ़ाई भी गांव के सरकारी स्कूल में हुई।

वंदना के पिता महिपाल सिंह चौहान कहते हैं, ‘‘गांव में स्कूल अच्छा नहीं था। इसलिए अपने बड़े लड़के को मैंने पढऩे के लिए बाहर भेजा। बस, उस दिन के बाद से वंदना की भी एक ही रट थी। मुझे कब भेजोगे पढऩे”

रूढ़िवादी गांव पिता ने भेजा पढ़ने के लिए गुरुकुल–

छठी क्लास के बाद वंदना को मुरादाबाद के पास लड़कियों के एक गुरुकुल में पढऩे के लिए भेजा गया। वहां के नियम बड़ेकठोर थे। कड़े अनुशासन में रहना पड़ता। खुद ही अपने कपड़े धोना, कमरे की सफाई करना और यहां तक कि महीने में दो बार खाना बनाने में भी मदद करनी पड़ती थी। हरियाणा के एक पिछड़े गांव से बेटी को बाहर पढऩे भेजने का फैसला पिता महिपाल सिंह के लिए भी आसान नहीं था। वंदना के दादा, ताऊ, चाचा और परिवार के तमाम पुरुष इस फैसले के खिलाफ थे। लेकिन वन्दना के पिता ने सबका गुस्सा झेला, सबकी नजरों में बुरे बने, लेकिन अपना फैसला नहीं बदला।’’

कभी कॉलेज नहीं गई IAS वन्दना–

बारहवीं तक गुरुकुल में पढ़ने के बाद वंदना ने घर पर रहकर ही लॉ की पढ़ाई की। कभी कॉलेज नहीं गई। परीक्षा देने के लिए भी पिताजी साथ लेकर जाते थे।

गुरुकुल का अनुशासन, नहीं लगाया गर्मी में कूलर–

गुरुकुल में सीखा हुआ अनुशासन एक साल तैयारी के दौरान काम आया। रोज तकरीबन 12-14 घंटे पढ़ाई करती। नींद आने लगती तो चलते-चलते पढ़ती थी। वंदना की मां मिथिलेश कहती हैं, ‘‘पूरी गर्मियां वंदना ने अपने कमरे में कूलर नहीं लगाने दिया। कहती थी, ठंडक और आराम में नींद आती है।’’ वंदना गर्मी और पसीने में ही पढ़ती रहती ताकि नींद न आए। एक साल तक घर के लोगों को भी उसके होने का आभास नहीं था। मानो वह घर में मौजूद ही न हो। किसी को उसे डिस्टर्ब करने की इजाजत नहीं थी। बड़े भाई की तीन साल की बेटी को भी नहीं। वंदना के साथ-साथ घर के सभी लोग सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। उनकी वही दुनिया थी।

IAS वन्दना ने नहीं देखी कभी फ़िल्म, न पार्टी न रेस्तरां–

वंदना ने कभी हरियाणा के बाहर कदम नहीं रखा। कभी सिनेमा हॉल में कोई फिल्म नहीं देखी। कभी किसी पार्क और रेस्तरां में खाना नहीं खाया। कभी दोस्तों के साथ पार्टी नहीं की। कभी कोई बॉयफ्रेंड नहीं रहा। कभी मनपसंद जींस-सैंडल की शॉपिंग नहीं की। अब जब मंजिल मिल गई है तो वंदना अपनी सारी इच्छाएं पूरी करना चाहती है घुड़सवारी करना चाहती है और निशानेबाजी सीखना चाहती है। खूब घूमने की इच्छा है।

गांव के जो लोग लड़की को पढ़ता देख मुंह बिचकाया करते थे, वंदना की सफलता पर गर्व से भरे हैं। मौका मिलने पर लड़की क्या कर सकती है, वंदना ने करके दिखा ही दिया है।

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