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अग्निपथ योजना अग्निवीर या मेहमान योद्धा- एक बेबाक विश्लेषण

देहरादून, डॉ० डी० सी० पसबोला (फिजिशियन एवं ब्लॉगर) भारतीय सेना में भर्ती होने के लिए केन्द्र सरकार ने अग्निपथ योजना शुरू की है। जिसमें चार वर्षों के लिए युवाओं को तीनों सेनाओं में शामिल होने का मौका मिलेगा। किन्तु अग्निपथ योजना देश और युवाओं के लिए कैसा रहेगा, यह जानना बहुत जरूरी है।

डॉ० डी० सी० पसबोला (फिजिशियन एवं ब्लॉगर)

एक ओर जहां केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस योजना के फायदे बताए और यह भी कहा कि अग्निपथ योजना के जवानों को अग्निवीर कहा जाएगा।

वहीं दूसरी ओर इस योजना के ऊपर खुद पूर्व जनरलों एवं रक्षा विशेषज्ञों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। रक्षा विशेषज्ञ पी के सहगल ने बताया कि  सरकार की यह बहुत खराब स्कीम है। यह सरकार के लिए अग्निपथ साबित हो सकता है। देश में बेरोजगारी बहुत है. 46 हजार लोगों को एक साथ भर्ती करने का जो प्लान सरकार ने अग्निपथ स्कीम के तहत तैयार किया है, यहां लोग आएंगे तो. फौज को ज्वाइन करेंगे लेकिन चार साल बाद उन्हें निराशा हाथ लग सकती है। चार साल बाद ‘अग्निवीरों’ को लगेगा कि उनके साथ गलत हुआ है।

पीके सहगल ने कहा है कि जब कोई आर्मी या दूसरी फोर्सेस से रिटायर होता है और आम जीवन जीने आता है। तो उनको बेहतर नौकरी नहीं मिलती है। उनको मिलती है गार्ड की नौकरी. जवानों को कॉर्पोरेट वर्ल्ड भी नहीं लेता। इन अग्निवीरों को आसानी से रेडिकलाइज किया जा सकता है। आसानी से इनको दूसरे कामों में लगाया जा सकता है। ऐसे में यह देश के लिए चुनौती साबित हो सकते हैं। अग्निवीरों को बाद में महसूस होगा कि 4 साल तक इनका इस्तेमाल करके इनको सर्टिफिकेट पकड़ा कर फेंक दिया गया है।

इस बात का भी अंदेशा है कि इन‌ अग्निवीरों का हाल भी कहीं गुरिल्ला योद्धाओं जैसा ही ना हो जाए।  वहीं एक बिंदु ये भी उभरकर सामने आ रहा है कि मेहमान सैनिकों के दम पर जंग नहीं जीती जाती है।

योजना की वह बात जिसे केंद्र सरकार अपने मुंह से तो नहीं कह रही है, लेकिन तमाम समाचार माध्यम, यहां तक कि स्वराज मैगजीन का पोर्टल भी कहा रहा है, वह है पेंशन के खर्च में कटौती.  2005 में नयी पेंशन स्कीम आने के बाद तमाम सरकारी नौकरियाँ, यहां तक कि अर्द्ध सैनिक बल भी पुरानी पेंशन के दायरे से बाहर कर दिये गए. केवल सेना ही बची थी, जहां रिटायरमेंट पर पेंशन मिल रही थी. चार साल के इस अग्निपथ के बाद सेना के पेंशन पट्टे भी अग्नि की भेंट चढ़ा दिए जाएँगे !

यह बात कि सैनिकों की पेंशन से सरकार पर अत्याधिक बोझ पड़ रहा है। जबकि सेनाओं में पेंशन की व्यवस्था तो अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है। तो वर्तमान भारत सरकार अंग्रेजों से भी गयी-गुजरी है कि वह सैनिकों को पेंशन नहीं दे सकती !

प्रश्न यह भी है कि किसी क्षेत्र में जब पक्की नौकरी नहीं देनी,  सम्मानजनक वेतन नहीं देना, पेंशन नहीं देना, आर्थिक सामाजिक सुरक्षा नहीं देना, तो उस सरकारी खजाने का पैसा सिर्फ विधायकों और सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाने, बड़े पूंजीपतियों के बैंकों के कर्जे और टैक्स माफ करने के लिए है क्या? जब एक दिन के लिए भी विधायक सांसद बनने पर पेंशन सुविधा है तो‌ फिर चार साल बाद रिटायर हुए अग्निवीर को पेंशन क्यों नहीं है।
फिर जो सैनिक देश की सीमाओं पर देश के लिए गोली खाएगा और आप उसे पक्की नौकरी और पेंशन तक नहीं देंगे ? ये कहां का न्याय है?

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