सिंह संक्रांति: सूर्य का राशि परिवर्तन, उत्तराखण्ड में सावन की समाप्ति “घी त्यौहार” घ्यू त्यार, घी संक्रांत

Uttarakhand दर्शन। संजय भट्ट। ज्योतिषीय के अनुसार सूर्य का गोचर 1 माह में होता है अर्थात सूर्य हर 30 दिन में एक राशि से दुशरी राशि में जाते है। जिसे संक्रांति कहा जाता है। भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग संक्रांति को पर्व-त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

2020 की संक्रांति की तिथियां-

बुधवार, 15 जनवरी मकर संक्रांति
गुरुवार, 13 फरवरी कुम्भ संक्रांति
शनिवार, 14 मार्च मीन संक्रांति
मंगलवार, 14 अप्रैल मेष संक्रांति
शुक्रवार, 15 मई वृष संक्रांति
सोमवार, 15 जून मिथुन संक्रांति
गुरुवार, 16 जुलाई कर्क संक्रांति
सोमवार, 16 अगस्त सिंह संक्रांति
गुरुवार, 17 सितंबर कन्या संक्रांति
शनिवार, 17 अक्टूबर तुला संक्रांति
सोमवार, 16 नवंबर वृश्चिक संक्रांति
बुधवार, 16 दिसंबरधनु संक्रांति

उत्तराखण्ड में भी सूर्य की राशि परिवर्तन यानी संक्रांति का विशेष महत्व है। उत्तराखण्ड में हिन्दू महीने की शुरुवात पूर्णिमा से न मानकर संक्रांत से मानी जाती है। आज से उत्तराखण्ड में सावन समाप्त हो गए।

आज 16 अगस्त को सूर्य व मंगल ग्रह राशि परिवर्तन करेंगे। 16 अगस्त को सूर्य ग्रह स्वराशि सिंह में शाम को 7 बजकर 11 पर प्रवेश करेंगे। जबकि इससे पहले 16 अगस्त को ही शाम 6 बजकर 34 मिनट पर मंगल ग्रह अपनी स्वराशि मेष में प्रवेश करेंगे। जबकि बुध ग्रह अगले दिन 17 अगस्त को सुबह 8 बजकर 12 मिनट पर सिंह राशि में प्रवेश कर बुधादित्य योग बनाएंगे।

सौर मासीय पंचांग के अनुसार आज सिंह संक्रांत है। इसी तरह बारह संक्रांतियां होती हैं, इस को भी शुभ दिन मानकर उत्तराखण्ड में कई त्योहार मनाये जाते हैं। और इन्ही त्यौहार में से एक है “घी त्यार” “घ्यू त्यार” “घृत संक्रांति”

उत्तराखण्ड में “घ्यू त्यार” की परंपरा-

देवभूमि उत्तराखण्ड में हिन्दी महीने की प्रत्येक एक गते यानी संक्रान्ति को लोक पर्व के रुप में मनाने का प्राचीन काल से प्रचलन है।

भाद्रपद मास या भादो महीने की भाद्रपद संक्रांति को ही घी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है।

जैसे हरेला बीज को बोने और वर्षा ऋतू के आने के प्रतीक का त्यौहार है। इसी तरह से “घी त्यार” अंकुरित हो चुकी फसल में बालियाँ के लग जाने पर मनाये जाने वाला त्यौहार है। किसानी से जुड़ा यह त्यौहार खेती बाड़ी और पशु के पालन से जुड़ा हुआ एक ऐसा लोक पर्व है जिसमे किसान अच्छी फसलों की कामना करते हुए खुशी मनाते हैं।

घी त्यार में फसलो में लगी बालियों को किसान अपने घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर या दोनों और गोबर से चिपकाते है। इस त्यौहार के समय पूर्व में बोई गई फसलों पर बालियां लहलहाना शुरु कर देती हैं। साथ ही स्थानीय फलों, यथा अखरोट आदि के फल भी तैयार होने शुरु हो जाते हैं। पौराणिक मान्यता है कि अखरोट का फल घी-त्यार के बाद ही खाया जाता है । इसी वजह से घी त्यार मनाया जाता है।

“घी त्यार” का महत्व-

उत्तराखण्ड में घी त्यार किसानों के लिए अत्यंत महत्व रखता है। और आज ही के दिन उत्तराखंड में गढ़वाली, कुमाउनी सभ्यता के अनुसार घी को खाना जरुरी माना जाता है।

पहाड़ों में नवजात बच्चों के सिर और पांव के तलुवों में भी घी लगाया जाता है। नवजात बच्चों की जीभ में थोड़ा सा घी रखा जाता है ।

इस समय बरसात में मौसम में पशुओं को खूब हरी घास चारा उपलब्ध होता है। जिससे घर में दूध में बढ़ोतरी होने से दही, मक्खन, घी की मात्रा प्रचुर होती है।

वनों से घिरे पहाड़ी प्रदेश उत्तराखण्ड में इस दिन का मुख्य व्यंजन बेडू की रोटी है। जो उड़द की दाल भीगा कर, पीस कर बनाई गई पिट्ठी से भरवाँ रोटी बनती है और घी में डुबोकर खाई जाती है। अरबी के बिना खिले पत्ते जिन्हें गाबा कहते हैं, उसकी सब्जी बनती है। आज के दिन घी के साथ ही खाना खाने का प्रचलन है।

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